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ये है वो आदमी, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को SC-ST ऐक्ट में बदलाव करना पड़ा

ये है वो आदमी, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को SC-ST ऐक्ट में बदलाव करना पड़ा

2 अप्रैल 2018. इस दिन देश भर के दलित संगठनों की अगुवाई में हजारों लोग देश के अलग-अलग इलाकों में सड़कों पर उतरे. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी ऐक्ट में जो बदलाव किया था, उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. इस आंदोलन का नेतृत्व किसी एक आदमी या संगठन के हाथ में नहीं था. नतीजा ये हुआ कि उत्त प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और बिहार में  हिंसा हो गई. इस हिंसा में कम से कम 10 लोग मारे गए. इस पूरे आंदोलन के पीछे की एक लंबी कहानी और कानूनी प्रक्रिया है.

भास्कर करभरी गैडवाड. ये नाम उस शख्स का है, जिसने एक मुकदमा दायर किया और फिर 9 साल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव कर दिया. भास्कर करभरी गैडवाड 2009 में महाराष्ट्र के सतारा जिले के कराड के गवर्नमेंट फॉर्मेसी कॉलेज में स्टोर कीपर थे. बाद में भास्कर गैडवाड को पुणे के गवर्नमेंट डिस्टेंस एजुकेशन इंस्टीट्यूट में पोस्टिंग दे दी गई. जब वो स्टोर कीपर थे, उस वक्त भास्कर गैडवाड के सीनियर थे सतीश भिसे और किशोर बुराड़े. सतीश भिसे और किशोर बुराड़े कॉलेज की वार्षिक रिपोर्ट भी बनाया करते थे. जब उन्होंने 2005-06 की वार्षिक रिपोर्ट तैयार की, तो उसमें उन्होंने लिखा था कि स्टोर कीपर भास्कर करभरी गैडवाड ठीक ढंग से काम नहीं कर पाते हैं और उनका व्यवहार ठीक नहीं है. ये एक गोपनीय रिपोर्ट थी.

जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल के फैसले के बाद 2 अप्रैल को भारत बंद बुलाया गया था.

2009 में दर्ज हुआ पहला केस

सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के आदेश के मुताबिक भास्कर करभरी गैडवाड को इस रिपोर्ट के बारे में पता चल गया. इसके बाद भास्कर करभरी गैडवाड ने कराड सिटी पुलिस स्टेशन में 2009 में एक मुकदमा दर्ज करवाया. इस मुकदमे में कहा गया कि भास्कर एक दलित थे, जबकि उनके दोनों सीनियर सतीश भिसे और किशोर बुराड़े सामान्य वर्ग से थे. इन दोनों ने उसके काम की वजह से नहीं, बल्कि उनकी जाति की वजह के प्रताड़ित किया गया. उसके खिलाफ जातिगत शब्द कहे .इन आरोपों के बाद कराड पुलिस स्टेशन में 3122/ 9 नंबर से एफआईआर दर्ज की गई. एफआईआर एससी-एसटी (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटिज ऐक्ट 1989) की धारा 3(1) 9, 3(2) (7)6 के तहत दर्ज किया गया. इसके अलावा आईपीसी की धारा 182(गलत जानकारी देना), 192(ऐसा दस्तावेज तैयार करना, जिसमें गलत जानकारियां हों), 193 (न्याय प्रक्रिया के दौरान गलत सबूत देना), 203 (गलत जानकारी देना) और 219 (सरकारी अधिकारी का न्यायिक प्रक्रिया के दौरान गलत जानकारी देना) के तहत भी केस दर्ज हुआ. इसके बाद कराड के डिप्टी एसपी भरत तांगडे ने मुकदमे की जांच शुरू की. उस वक्त सतीश बालकृष्ण भिसे फॉर्मेसी कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जबकि किशोर बालकृष्ण बुराड़े कॉलेज में प्रोफेसर थे. जांच अधिकारी भरत तांगड़े ने मुकदमे से जुड़े सारे सबूत इकट्ठा किए, लेकिन दोनों ही आरोपी सरकारी अधिकारी थे और टेक्निकल एजुकेशन डिपार्टमेंट के क्लास 1 के अधिकारी थे.

इसी कॉलेज में काम करते थे भास्कर गैडवाड, जहां से उनका ट्रांसफर पूना कर दिया गया.

जांच हुई, लेकिन नहीं फाइल हो पाई चार्जशीट

इसलिए भरत तांगड़े ने 21 दिसंबर 2010 को चार्जशीट दाखिल करने से पहले सीआरपीसी की धारा 197 के तहत उस वक्त ऑफिस के डायरेक्टर रहे सुभाष काशीनाथ महाजन को एक पत्र लिखा. काशीनाथ महाजन दलित समुदाय से ताल्लुक नहीं रखते थे, लेकिन पीड़ित दलित समुदाय का था. दोनों आरोपी भी एससी-एसटी नहीं थे. जब भरत तांगड़े ने सुभाष महाजन को पत्र लिखा तो सुभाष महाजन ने कहा कि उनके ऑफिस के पास अधिकार नहीं हैं कि वो कोई आदेश दे सकें. इसके बाद सुभाष महाजन ने मुंबई ऑफिस को एक पत्र लिखा. हालांकि मुंबई ऑफिस के पास भी ये अधिकार नहीं था कि वो पुलिस को कह सके कि वो चार्जशीट फाइल करें या न करें. मामला घूमकर फिर से सुभाष महाजन के पास आ गया और फिर सुभाष महाजन ने 20 जनवरी 2011 को चार्जशीट दाखिल करने का आदेश देने से इन्कार कर दिया.

सात साल बाद एक और अधिकारी के खिलाफ दर्ज हुआ केस

इस आदेश के बाद भरत तांगड़े के पास कोई उपाय नहीं बचा और उन्होंने चार्जशीट दाखिल नहीं की. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक भास्कर गैडवाड को इस बारे में पता ही नहीं चला. करीब छह साल बाद जब भास्कर को इस बात का पता चला तो गैडवाड ने करीब छह साल के बाद 28 मार्च 2016 को सुभाष महाजन के खिलाफ भी एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज करवाया और आरोप लगाया कि सुभाष महाजन ने उसके खिलाफ हुए अपराध के अपराधियों को बचाया है. जब आरोप सुभाष महाजन तक पहुंच गया, तो सुभाष महाजन सबसे पहले तो अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट के पास पहुंचे. कोर्ट ने उनकी जमानत मंजूर कर ली. इसके बाद अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करवाने के लिए सुभाष महाजन फिर से बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचे. वहां उन्होंने कोर्ट से अपील की कि वो इस पूरे केस को खारिज कर दें, क्योंकि गैडवाड ने अपनी परफॉर्मेंस खराब होने के बाद उनके खिलाफ केस दर्ज किया. बॉम्बे हाई कोर्ट ने सुभाष महाजन के तर्कों को नहीं माना और 5 मई 2017 के अपने आदेश में सुभाष महाजन की अर्जी खारिज कर दी. इसके बाद सुभाष महाजन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और फिर सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 को एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव का आदेश दे दिया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एससी-एसटी संगठनों ने पूरे देश में प्रदर्शन किया.

एक महिला के खिलाफ भी दर्ज करवाया गया था एससी-एसटी ऐक्ट में मुकदमा

इस आदेश को देने से पहले सुप्रीम कोर्ट में लंबी बहसें हुईं. कई तारीखें पड़ीं, लेकिन सबसे अहम रोल था एक महिला का. वो महिला पुणे के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के डिपार्टमेंट ऑफ इंस्टुमेंटल एंड कंट्रोल में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वो पिछले आठ साल से इस पद पर हैं. कराड़ से ट्रांसफर होने के बाद गैडवाड पुणे के इसी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में स्टोर कीपर के पद पर तैनात कर दिए जाते हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर ने गैडवाड के खिलाफ सेक्सुअल हरासमेंट का केस दर्ज करवाया और इसके जवाब में गैडवाड ने महिला असिस्टेंट प्रोफेसर के खिलाफ एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज करवा दिया. ये एफआईआर 2 नवंबर 2017 को खड़की पुलिस स्टेशन में दर्ज करवाई गई. एफआईआर दर्ज होने के बाद असिस्टेंट प्रोफेसर अंतरिम जमानत के लिए सेशन कोर्ट पहुंचीं, जहां से उनकी जमानत खारिज कर दी गई. इसके बाद महिला असिस्टेंट प्रोफेसर हाई कोर्ट पहुंची. वहां से हाई कोर्ट ने 23 नवंबर 2017 को उनकी अंतरिम जमानत मंजूर कर ली. इसके बाद 2 दिसंबर 2017 को गैडवाड को सीआरपीसी की धारा 107 के तहत मैजिस्ट्रेट का एक नोटिस मिला. असिस्टेंट प्रोफेसर की तरफ से मनीषा टी करिया ने कोर्ट में दलीलें दीं और फिर कोर्ट ने पाया कि गलत मुकदमों से बचने के लिए कोई भी सेफगार्ड नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त किए थे एमिकस क्यूरी

इस पूरी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) बनाए थे. इनमें अडिशनल सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह और सीनियर काउंसिल सीयू सिंह ने अपने तर्क रखे और पाया कि गैडवाड के मामले में किसी तरह से भी एससी-एसटी ऐक्ट 1989 का उल्लंघन नहीं हुआ है. इसके अलावा आईपीसी की धारा 182, 192, 193, 203 और 219 का उल्लंघन नहीं हुआ है. इसलिए बॉम्बे हाई कोर्ट को पहले ही इस पूरे मुकदमे को खारिज कर देना चाहिए था. इसके अलावा एमिकस क्यूरी ने ये भी पाया कि गैडवाड के खिलाफ सुभाष महाजन ने 20 जनवरी 2011 को आदेश दिया था, लेकिन उसके पांच साल के बाद 28 मार्च 2016 को एससी-एसटी ऐक्ट के तहत केस दर्ज करवाया गया.

पूरी सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने सुभाष महाजन को बरी करते हुए एससी-एसटी ऐक्ट में बदलाव को मंजूरी दे दी. इसका नतीजा था कि कोर्ट के फैसले के खिलाफ 2 अप्रैल 2018 को पूरे देश के दलित सड़कों पर उतर आए. इस आंदोलन में हिंसा हो गई, जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई. केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ रिव्यू पीटिशन फाइल कर दी, जिसपर कोर्ट 3 अप्रैल को सुनवाई कर रही है.

SC-ST ऐक्ट पर भारत बंद, देश के कई हिस्सों में हिंसा, अब तक पांच की मौत

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